Bihar
चिराग पासवान का मुंह मोड़ना और भाजपा का मनाने का प्रयास — एक पुरानी परंपरा; वे मान जाएंगे और पीछे नहीं हटेंगे
कुछ दलों के अंदर यह पैटर्न बन गया है कि कोई नेता थोड़ा सा विरोध जताता है, लेकिन बाद में वे झुक जाते हैं। चिराग पासवान के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। उन्होंने कुछ दिनों पहले बीजेपी से नाराजगी दिखाई थी, लेकिन राजनीतिक माहौल और दबाव की स्थिति में उनसे यह अपेक्षा की जा रही है कि वे अंततः सहमत हो जाएंगे और पीछे नहीं हटेंगे।
बीजेपी और उसके साथियों की कोशिश यही रहती है कि वे ऐसे मतभेदों को सुलझा लें और गठबंधन को मज़बूत रखें। चिराग की नाराजगी को लेकर चर्चाएँ सुर्खियों में आईं तो बीजेपी को कार्रवाई करनी पड़ी, वार्ता करनी पड़ी। लेकिन राजनीतिक समीकरण यह बताते हैं कि अंततः वे सहमत हो जाएंगे — क्योंकि विरोध करना आसान है, टिके रहना मुश्किल।
इस लेख में यह तर्क दिया गया है कि चिराग पासवान का “गुस्सा दिखाना” और भाजपा का “मनाने का प्रयास” बिहार-झारखंड की राजनीति में पहले भी कई बार देखा गया है। कई बार यह देखा गया कि जिस समय मतभेद उभरते हैं, पार्टी या गठबंधन उन मतभेदों को दबा देते हैं और आगे बढ़ते हैं। इस बार भी ऐसा ही कुछ होने की संभावना जताई जा रही है।